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विवाह8 min2026-04-30

ज्योतिष में दूसरा विवाह: कुंडली में संकेत

आपकी जन्म कुंडली में कौन से ग्रह संयोजन दूसरे विवाह की संभावना का संकेत देते हैं? ज्योतिषीय संकेतकों पर एक व्यापक नज़र।

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विद्वान द्वारा सत्यापित
अंतिम संशोधन: अप्रैल 2026
संदर्भ: पाराशर होरा शास्त्र
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ग्रेहाई रिसर्च टीम

वैदिक ज्योतिष में दूसरा विवाह

वैदिक ज्योतिष में दूसरे विवाह के संकेतों को देखने के लिए कुंडली के कई भावों और ग्रहों का समग्र विश्लेषण किया जाता है। कोई एक ग्रह या भाव अकेले दूसरे विवाह की "गारंटी" नहीं देता। 7वें भाव (विवाह), 8वें भाव (परिवर्तन/दूसरा विवाह), शुक्र (विवाह कारक), और संबंधित दशाओं का समन्वय देखा जाता है। जब इनमें से अधिकांश कारक एक साथ प्रतिकूल हों, तो दूसरे विवाह की संभावना बढ़ जाती है।

8वां भाव — दूसरे विवाह का भाव

ज्योतिष में 7वें भाव से 8वां अर्थात् लग्न से 2वां भाव पहले विवाहित जीवन की समाप्ति और दूसरे विवाह की संभावना का भाव माना जाता है। 8वां भाव परिवर्तन, अचानक बदलाव, और मृत्यु/पुनर्जन्म का भाव है — विवाह के संदर्भ में यह पहली शादी की समाप्ति और नई शुरुआत का प्रतीक है। 8वें भाव में पाप ग्रहों की उपस्थिति और 8वें भाव के स्वामी की 7वें या 2वें भाव से संबंध दूसरे विवाह के प्रमुख संकेत हैं।

शुक्र पर एकाधिक पीड़ा

  • शुक्र + राहु संयोजन: राहु शुक्र के साथ विवाह में भ्रम, असंतोष, और बार-बार साथी बदलने की प्रवृत्ति बनाता है।
  • शुक्र + मंगल संयोजन: तीव्र जुनून और संघर्ष — विवाह में आवेशी और कभी-कभी हिंसक तनाव।
  • शुक्र नीच राशि में: शुक्र का कन्या राशि में नीच होना — विवाहिक सुख में कमी और साथी से असंतुष्टि।
  • शुक्र अस्त: सूर्य के बहुत समीप शुक्र का अस्त होना — विवाह संबंधी निर्णयों में कमजोरी।

7वें भाव में शनि से विच्छेद

7वें भाव में शनि अकेले आमतौर पर तलाक नहीं देता — वह विवाह में देरी और ठंडापन लाता है। लेकिन जब शनि के साथ राहु, मंगल, या सूर्य भी 7वें भाव में हों, या 7वें भाव का स्वामी 6वें-8वें-12वें में कमजोर हो, तो पहला विवाह टिकाऊ नहीं होता। ऐसे में 30 के बाद दूसरे विवाह की अच्छी संभावना होती है — शनि की परिपक्वता के साथ।

7वें भाव पर राहु/केतु का प्रभाव

राहु-केतु की धुरी जब 1-7 भाव पर हो, तो 7वां भाव सीधे प्रभावित होता है। राहु 7वें भाव में: असंतोष, पहले विवाह से भागने की इच्छा, विदेशी साथी की खोज — दूसरे विवाह की उच्च संभावना। केतु 7वें भाव में: वैराग्य और विवाह में रुचि न होना — पहला विवाह भावनात्मक रूप से खालीपन देता है, जिससे दूसरे की तलाश होती है।

द्वि-पत्नी योग के संकेत

द्वि-पत्नी योग (एक से अधिक पत्नी/पति का योग) के प्रमुख संकेत: 7वें भाव में दो या अधिक ग्रह + 7वें भाव का स्वामी दुर्बल; शुक्र और मंगल दोनों 7वें भाव को प्रभावित करें; शनि और राहु का 7वें भाव या सप्तमेश पर प्रभाव; नवमांश में भी 7वां भाव पीड़ित हो। अकेले लग्न कुंडली से निष्कर्ष न निकालें — नवमांश (D-9) की पुष्टि आवश्यक है।

दशा काल — शुक्र-शनि अवधि

दूसरा विवाह आमतौर पर शुक्र-शनि अंतर्दशा, शुक्र-राहु अंतर्दशा, या 7वें/8वें भाव के स्वामी की महादशा में होता है। बृहस्पति का 7वें भाव में गोचर और शनि का अनुकूल गोचर भी द्वितीय विवाह के समय को चिह्नित कर सकता है। दशा और गोचर दोनों का एक साथ अनुकूल होना दूसरे विवाह के लिए सबसे मजबूत संकेत है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

7वें भाव में कौन से ग्रह दूसरे विवाह का संकेत देते हैं?

राहु, मंगल या शनि का 7वें भाव में होना और कमजोर सप्तमेश — मिलकर दूसरे विवाह की संभावना बढ़ाते हैं। 7वें भाव के स्वामी का 6वें, 8वें या 12वें में होना और शुक्र की पीड़ा इस प्रवृत्ति को और बढ़ाती है।

क्या स्त्री कुंडली में भी द्वि-पत्नी योग होता है?

हाँ। स्त्री कुंडली में शुक्र और 7वें भाव पर एकाधिक पीड़ा, शनि का 7वें में, या राहु-केतु की 7वें भाव पर धुरी दूसरे विवाह की संभावना दर्शाती है। एकल ग्रह से निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।

दूसरा विवाह किस दशा में होता है?

शुक्र महादशा (विशेषतः शुक्र-शनि, शुक्र-राहु अंतर्दशा), बृहस्पति महादशा, या 7वें-8वें भाव के स्वामी की दशा में दूसरा विवाह सबसे अधिक होता है।

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GrahAI विशेषज्ञ टीम

April 16, 2026 9 min पढ़ें

वैदिक ज्योतिषी और डेटा वैज्ञानिक

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